Showing posts with label ह्रदय द्रवीभूत. Show all posts
Showing posts with label ह्रदय द्रवीभूत. Show all posts

Monday, December 30

How to do japa/chanting ?~1

हरे कृष्ण 
गोपाल..


hints for japa-

1.the most effective time is early  dawn and dusk when sattva or purity Is predominant.

2.regulariy is vital and while doing the japa, you  must have the bhava or emotion that Atma,Ishvar,Devta and mantra are one.

3.dyring japa of any mantra,visualize your ishta devata,chosen deity,looking at you with compassion.

4.when the mind wander too much, do verbal japa.as the mind becomes steady,do mantal japa.

5.a beginner should use a japamala.later, he can take recourse to manasik japa or mental repetition.

6.use only the middle finger and thumb of right hand for rolling the beads.do not use the index finger.

7.do not cross the meru or crown or head of the mala while rolling the beads.turn back when you come to this point.

Japa generates heat in the body.hence an asana is important for a serious sadhak.use a woolen or kusha grass mat to sit on.

8.sattvik food is essential for generating purity of thought. As you eat,so you think.eat light.

The final frontier of all sadhana or meditation is constant remembrance of your aradhya, the Divine.the best vehicles to get you there are japa or chanting and smaran or repetition of God’s names.japa is one of the most effective means to turn inwards, as it helps to silence the thought process.intense practice of the incessant repetition of the lord’s name has the power to pulverize all karmic residues that hinder the ultimate goal of attainment of the divine abode.

Japa is the repetition of a mantra, the name of God which is a manifestation of the divine in the form of shabda,word or sound.by chanting the guru mantra, you invoke God in a tangible way.chanting purifies and quietens the mind without which it is impossible to attain the ultimate.japa leads the sadhak or seeker to a deeper understanding of his own divine nature.and japa protects.


text 2011, copyright © bhaktiprachar.in

Thursday, December 29

हृदय द्रवीभूत~2

हरे कृष्ण
गोपाल....

 हमारी भी लगन उन प्रभु में लग जाये पर लगन भी कैसी-
लगन लगन सब कोई कहे लगन कहावे सोय |
नारायण व लगन में तन मन दीजे खोय ||

प्रेम में मगन होकर भगवन का भजन लगन से करे और भगवन के आगे करुनाभाव से रोते रहे-"हे नाथ हे हरी हे गोविन्द हे वासुदेव ! मुझे तो केवल आपका ही सहारा है,मेरा आपके बिना और कोई अधर नहीं है| प्रभु ! मेरे मन में न ज्ञान है,न भक्ति है,न वैराग्य है और न ही प्रेम है | मेरे में तो कुछ भी नहीं है | मै तो केवल आपकी शरण में हूँ,वह भी केवल आपके वचन  मात्र से | प्रभु | मै ह्रदय से आपकी शरण में हूँ | हे प्रभु मै तो इतना चालक हूँ की आपको आपके सामने तो कहता हूँ की गलत काम नहीं करूँगा पर जब विवेक खो देता हूँ तो काम और क्रोध में लिप्त हो जाता हूँ | प्रभु अप तब भी मुझ पर कृपा करते हो | भगवन मै कैसा भी हूँ बस ये अब जन गया हूँ की तुम्हारा हूँ |"
श्याम सुन्दर सदा प्यारे रहे...हम उन्ही के रहे वो हमारे रहे...
भजन में भगवन के नाम का कीर्तन एक स्वर और एक ताल से किया जाये तो इतना प्रिय लगता है की मन कहता है कि कीर्तन ही होता रहे| ऐसे कीर्तन में सात्विक और अलौकिक रस आता है जो परमात्मा क़ी प्राप्ति में  बहुत ही सहायक है | इससे भगवान में प्रेम बढ़ता  है |
                          कीर्तन करते हुए ऐसा मनो क़ी भगवान यहाँ आ पहुचे है | भगवान ने भक्तकी  टेर  सुनी  इर टेर सुनके आ पहुचे | मन में यह सोचना है क़ी भगवान वास्तव में ही यहाँ आ गये है |आकाश में स्थित हो कर हम सब पर गुणों क़ी वर्षा कर रहे है | भगवान दया के सागर है और प्रेम के पुंज है |
किसी को ऊपर सागर उड़ेल दिया जाये तो उसके चारो तरफ जल ही जल द्रष्टिगोचर होगा | उसी प्रकार मनो  भगवान  ने दया का सागर हमारे ऊपर उड़ेल दिया है और हम दया में एकदम मग्न हो गए है |हमारा रोम रोम , जर्रा जर्रा पुलकित हो उठा है |
दया से आगे बढ़कर उनके प्रेम क़ी तरफ देखे -देखो,भगवान मुझ पर कितना प्रेम कर रहे है,हम उसके लायक ही नहीं,किन्तु भगवान मुझ अयोग्य,अनधिकारी पर कितने प्रेम भरी द्रष्टि से देख रहे है |भगवान केवल पात्र के ऊपर ही दया और प्रेम करे एस बात नहीं है | वे सब पर कृपा करते है | भगवान हमारे भी है और रावण के भी |पर रावण ने उन्हें शत्रु भाव से भजा पर उन्होंने उस पर भी कृपा क़ी तो सोचो हम तो उनसे प्रेम मांग रहे है तो वे क्या हम पर कृपा नहीं करेंगे ?
आप जहां भी जायें गे आपकी परछाई आपके साथ जाये गी. सिक्के खनके गे तो मुस्कराहट तो आये गी ना! बारिश होगी तो मिटटी की भीनी-भीनी खुशबु तो आये गी ना! बीज बोये गे तो फसल भी उगे गी! सूरज निकलने पर उसका प्रकाश और उसकी ऊष्मा मिले गी ही! सरोवर में नहाने से जल की शीतलता अपने आप मिले गी! आपको कोई प्रयतन नहीं करना होगा.ठीक उसी प्रकार नाम सुमिरन करेंगे  तो आत्मिक आनंद और प्रभु क़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी ही |
क्रमश:

 article help by-raghu raj soni(join on facebook)
text 2011, copyright © bhaktiprachar.in

Friday, December 23

ह्रदय द्रवीभूत~1

हरे कृष्ण
गोपाल.....
   

किसी का किसी के प्रति जब ह्रदय  पिघल जाता है तो उस समय उसकी वैसी ही दशा हो जाती है,जैसी चपड़े  या लाख के पिघल जाने पर हो जाती है |पिघले हुए चपड़े में जैसे रंग डाल दिया जाय,वह वैसे ही रंगवाला बन जाता है |यदि वह चपड़ा बिना पिघला हुआ हो तो उस पर चाहे कुछ भी डाल दिया जाय उसका कोई खास असर नहीं पड़ता | इसी तरह किसी का ह्रदय जब पिघल जाता है तब बहुत ही अच्छा रंग चढता  है |
हमें हरि का यानि भगवान का रंग चढ़ाना है |भगवान की कृपा से यदि आदमी का ह्रदय व्याकुल हो जाय तो उसका जीवन बहुत ही बदल जाय |यह लेख लिखते समय पूज्य राधा कृष्ण जी महाराज का के भजन सुन रहा हूँ | उसमे बताया की जब भक्त भगवद आवेश में होता है तो उसकी नजर जिस तरफ भी जाती है वह दिशा पवित्र हो जाती है,वह सम्पूर्ण भू मंडल को पवित्र कर देता है |प्रश्न यह है की ह्रदय इस प्रकार कैसे पिघले?
इसका उपाय यह है की जिन पुरुषो का ह्रदय भगवान के विरह की वय्कुलाता में पिघला है,उनके चिरित्र को करुनाभाव या प्रेम भाव से यद् करे| ऐसा करने ह्रदय एक दम पिघल जाता है और करुनाभाव से उनका चरित्र देखने से विरह की व्याकुलता मर भी ह्रदय पिघल जाता है | जैसे श्री रामचंद्र जी और भारत जी के चरित्र है,विशेषकर उनके मिलाप-प्रसंग का दृश्य सामने आते ही अपने -अप अश्रुपात होने लगता है|माता-पिता के भक्त श्रवणकुमार का प्रसंग आने से ह्रदय एकदम पिघल  जाता है| भगवान श्री रामचन्द्रजी के वनगमन का प्रकरण या रुक्मिणी जी का भगवान की विरह में विलाप-प्रकरण और गोपिओ का भगवान के विरह की व्यकुअलाता में रोने का प्रसंग उपस्थितहोने पर ह्रदय पिघल जाता है |प्रभु के कथा और इसप्रकार के प्रसंग और संवेदन शील प्रसंग हमारे ह्रदय को द्रवीभूत कर देते है | ऐसे प्रसंग अपने सद्गुरु से संतो  से बार बार सुनने चाहिए | जिस समय मन या ह्रदय एकदम पिघल jata है,उस समय ह्रदय में धारण किये गए भाव स्थायी रूप से सुस्थिर हो जाते है | इसलिए भगवन के प्रति प्रेम और श्रध्दा अपने ह्रदय में स्थापित करके रोम रोम में परिपूर्ण करके अपना जीवन बदल जय इसके लिए हमें करुनाभाव से समय समय पर भगवन के लिए रोना चाहिए,व्याकुल होना चाहिए,इसके लिए लगन से हमें रहना होगा क्योकि हमें उस को पाना है |क्रमश: